आवारी कलम !

न तेरी, न मेरी, न उसकी, है ये सबकी ‘ज़ुबान’.


जब जब उठती है,
जब जब चलती है,
न देखती आये , न देखती बाए, 
बनके तूफ़ान सी बरसती है !
जो ताकत है नहीं पहलवानो मे,
वो ताकत लेके लड़ती है !
कभी आशिक़ो की शायरी,

तोह कभी दर्द भरी ग़ज़ल उगलती है,
जब करना  हो  मुश्किल  का  सामना ,
तो हज़ारो की ज़ुबान बन जाती है !
है ये कलम अावारी, 
न किसी का डर, न  किसी की शरम,
है निडर ये , जब लिखती है ,  तोह  ‘सच ‘ लिखती चली जाती है !


पैगाम

2 thoughts on “आवारी कलम !

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  1. वाह, वाह, क्या शेर अर्ज़ किया है !!! भई आपकी कलम तो बहुत खूब है !आपकी कलम लाजवाब !
    कलम का ऐसा सुन्दर चित्रण शायद ही पहले किसी ने किया हो ~
    इस सु-रचना के लिये आपके के प्रति हमारी ढ़ेर सारी तालियाँ, अभिनन्दन और शाबाशी 🙂

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